यहाँ आपके प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं:
① द्वयोरेकस्योतर प्रदेयम् (किसी एक का उत्तर दें): 5 marks
आचार्य विश्वनाथोक्त काव्य प्रयोजनम् लिखत?
आचार्य विश्वनाथ ने 'साहित्यदर्पण' में काव्य के प्रयोजन के बारे में कहा है:
"चतुर्वर्गफलप्राप्तिः सुखादल्पधियामपि। काव्यादेव यतस्तेन तत्स्वरूपं निरूप्यते॥"
अर्थात्— काव्य से पुरुषार्थ चतुष्टय (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) की प्राप्ति अत्यंत सरल तरीके से और अल्प बुद्धि वालों को भी आनंदपूर्वक हो जाती है।
अथवा
वाक्यं रसात्मकं काव्यम् इति मतमालोचयत?
यह आचार्य विश्वनाथ का काव्य लक्षण है। उनके अनुसार, 'रसयुक्त वाक्य ही काव्य है।' उन्होंने रस को काव्य की आत्मा माना है। यदि किसी वाक्य में रस नहीं है, तो उसे काव्य की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। यह मत साहित्य शास्त्र में अत्यंत सरल और व्यापक माना जाता है।
② द्वयोरेकस्योतर प्रदेयम् (किसी एक का उत्तर दें): 3 marks
श्लेषालङ्कारस्य लक्षणं उदाहरणं च लिखत?
लक्षण: "श्लिष्टैः पदैरनेकार्थाभिधाने श्लेष इष्यते।" (जहाँ एक ही पद के अनेक अर्थ निकलते हों, वहाँ श्लेष अलंकार होता है।)
उदाहरण: "प्रतिकूलतामुपगते हि विधौ विफलत्वमेति बहुसाधनता।" (यहाँ 'विधौ' शब्द के दो अर्थ हैं— भाग्य और चन्द्रमा।)
अथवा
रूपकालंकारस्य लक्षणं उदाहरणं च:
लक्षण: "तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः।" (जहाँ उपमान और उपमेय में अभेद दिखाया जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है।)
उदाहरण: "मुखचन्द्रं पश्यामि।" (यहाँ मुख और चन्द्रमा में अभेद दिखाया गया है।)
③ प्रत्येकं समीचीनमुत्तरं चिनुत (सही उत्तर चुनें): 2 Marks
(क) 'रीतिरात्मा काव्यस्य' इति केनोक्तम्?
उत्तर: (iv) वामनेन (आचार्य वामन ने रीति को काव्य की आत्मा माना है।)
(ख) अनुप्रासः कति विधम्?
उत्तर: (i) पञ्च (अनुप्रास अलंकार के पाँच भेद होते हैं: छेकानुप्रास, वृत्यानुप्रास, श्रुत्यानुप्रास, अन्त्यानुप्रास और लाटानुप्रास।)

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